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Sunday, January 24, 2010

ग्लास पेंटिंग्स

ग्लास पेंटिंग्स बनाने का शौक था उसको, रंग ही उसका सब कुछ होने लगे थे। यूँही बनाते बनाते नजाने कितनी ही बना डालीं उसने। इतनी की चारों ओर बस वही दिखाई देती थीं उसके छोटे से कमरे में दीवारें नहीं थीं, सिर्फ खिड़कियाँ ही थीं। हर खिड़की पर एक पेंटिंग रखी थी उसने
फिर एक दिन हवा ने अपना रुख बदला, और खिडकियों पर दस्तक दी। नजाने किस देश से आई थी कि उसे बड़ीअच्छी लगी। और उसने खोल दिए किवाड़ सारे। वो तो खो ही गया था उन झोकों में। जब होश आया तो हवा थी और ही वो रंग। हवा में खिडकियों के परदे ऐसे झूमे थे की हौले हौले एक एक पेंटिंग का वजूद ख़त्म होता गया था।
बस रह गए थे वो कांच के बिखरे हुए टुकड़े फर्श पर। उन टुकड़ों को समेटने की बहुत कोशिश की थी उसने, एक शक्ल देने की। पर हर बार उन्हें उठाते हुए हाथ कट जाता था, कभी कभी कुछ कतरे खून भी बह जाता था। और वो यही सोचता रह जाता था कि ये टुकड़ा किस पेंटिंग का है।
जब दर्द का एहसास होता था तो सोचता कि फेंक ही दूंगा इन्हें अब कहीं, लेकिन फिर ख़याल आता कि क्यूँ एक कोशिश और की जाये इन्हें जोड़ कर एक मुकम्मल शक्ल देने की। इसी कशमकश में रह जाता था। पर इन कोशिशों में हाथ बहुत कट गए हैं उसके सोच रहा था की अब खिड़कियाँ निकलवा कर पूरी दीवार ही बनवा दे। खिड़कियाँ रहीं तो हवा की दस्तक का डर नहीं रहेगा।

सोचती हूँ की आज जब वो सो जायेगा तो मै ही जाके उन्हें समेट कर ले आयुंगी और रख लूंगी अपनी अलमारी में। पुराने निशान रहें तो नयी शुरुआत शायद आसान हो।

और फिर बने कुछ पेंटिंग्स.. फिर बने कुछ रिश्ते..

3 comments:

CY|\|O$|_|RE said...

firstly...its a nice composition......

purane zakhm kabhi bharte nhi hain.....lekin humein to nayi shuruaat ke sahare hi purane zakhmon ko bharna padta hai.....

Sid said...

stories never emerge out of mere imagination. They emerge from life.
baat nikli hai to phir door talak jayegi...

deep said...

@Cynosure: thanks...u r rite
@Sid: thats true... but hum bhi dekhte hain kitni door ja payegi..

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