नहीं समझा क्या कहना चाहते थे हम,
ख़त लिखा भी था तुम्हारे नाम, फिर मिटा दिया.
जो कागज़ पे आया वो गलत था,
और जो मन में था वो भी कहाँ सही था.
कुछ न कहना ही बेहतर होगा शायद .
कोरा कागज़ भेजा है,
हो सके तो पढ़ लेना.
A collection of moments, that have brushed away. Although this may seem as stupid talks later, and make me and others laugh but somehow they are holding me now.
2 comments:
Dear, kabhi kabhi kuch baaton ko ankaha hi rehne dena chahiye kyunki kabhi-2 ankahi baatein samajhna jyada easy hota hai...
wahh!!
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