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Thursday, August 11, 2011

अनकही


नहीं समझा क्या कहना चाहते थे हम,
ख़त लिखा भी था तुम्हारे नाम, फिर मिटा दिया. 
जो कागज़ पे आया वो गलत था,
और जो मन में था वो भी कहाँ सही था.
कुछ न कहना ही बेहतर होगा शायद .

कोरा कागज़ भेजा है,
हो सके तो पढ़ लेना.

2 comments:

CY|\|O$|_|RE said...

Dear, kabhi kabhi kuch baaton ko ankaha hi rehne dena chahiye kyunki kabhi-2 ankahi baatein samajhna jyada easy hota hai...

Meghana said...

wahh!!

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